Tuesday, 15 September 2020

Hamre Jaane Ke Baad Hamara Chasma Tumko Dhudhega

शरद आस्मां मेँ एक पुराना नशा तुमको ढूढ़ेगा
हमारे जाने के बाद हमारा चश्मा तुमको ढूढ़ेगा

लोग सो जायेंगे दोपहर के थके - हारे घरो मेँ
तब रातों की धुंध मेँ इक अँधेरा तुमको ढूढ़ेगा

इक रोज फिर मै तुमको सताने आ सकता हूँ
जब कोई नया दीवाना हम जैसा तुमको ढूढ़ेगा

लोग ढूढेंगे नक्शो मेँ नए नए शहरों के नाम
पर हर नज़र मेँ हमारा ही चेहरा तुमको ढूढ़ेगा

मुझको शक है इसलिए तुमको छुपा रहा हूँ में
जो भी तुम्हारे नाम को देखेगा तुमको ढूढ़ेगा

मर जाएगी मोहब्बत 'मजबूर' की उस रोज़ ही
जिस रोज़ उसका दबा हौसला तुमको ढूढ़ेगा



Saturday, 13 June 2020

अगर इतनी जल्दी संभल जाता ( Agar Itni Jaldi Sambhal Jata )

अगर इतनी जल्दी संभल जाता 
दिल का मतलब ही बदल जाता

बड़ा असां हो जाता मरना मेरा
वो सच में दिल से निकल जाता

जो बैठ लेता साथ मेरे पल भर
परिंदो जैसे ये परिंदा भी मचल जाता

बोलते इतनी रंजिश थी मोहब्बत में
तुम्हारे निगलने से पहले खुदको निगल जाता

ऐसे उबला हूं यादों में उसकी
की कड़ाई चढ़ा दे तो उबल जाता

कोई नहीं आया मजबूर सफर में
आ जाता तो मेरा सिक्का भी चल जाता

Thursday, 11 June 2020

इस पीपल के पत्ते झड़ने वाले है ( Is Pipal ke Sab Patte Jhadne Wale )

इस पीपल के पत्ते झड़ने वाले है 
अब कहा वो हमको पढ़ने वाले है 

खुदको छोड़ दिया हमने यही सोच 
के पत्थर भी कहा पिघलने वाले है 

उनको देखो वो घर बाँटने चले 
क्या सच में दो भाई लड़ने वाले है 

फर्क ना इसको है ना उसको है 
मुफ्त में रासन सब मांगने वाले है

बाग़ में खिलने से डर रहे है फूल 
बाहर बेटियों को भी नोचने वाले है 

इंसान तुझको शर्म क्यों नहीं आती 
घरो के सब ही दीये बुझने वाले है

Saturday, 6 June 2020

ग़ज़ल - दो रोटी वाला मुहब्बत करने चल दिया था ( Do Roti Wala Mohbbat Karne Chal Diya Tha )

की हकीकत ने मुझको दिखा दिया मुझको 
मीठा भी कड़वा होता है बता दिया मुझको

मेने घर फुक दिया अपने ही हाथो अपना 
किसी ने दुनिया क्या सीखा दिया मुझको 

दो रोटी वाला मुहब्बत करने चल दिया था 
शुक्रिया फिर से मकाम पे ला दिया मुझको 

मुझको पानी की तलब थी शराबी नहीं था 
उसने ही लबो से गम पिला दिया मुझको 

मैं सोने चला था एक अलग ही दुनिया में 
माँ ने कॉल किया और उठा दिया मुझको
 
मजबूर लिखता है सीने में दर्द उठता है 
बस मुहब्बत ने शायर बना दिया मुझको

पत्तो से ही सही पर घर बना मुझको ( Patton Se HI Sahi Par Ghar Bana Mujhko )

इनायत नहीं मुहब्बत दिखा मुझको 
पत्तो से ही सही पर घर 'बना' मुझको 
 
मैं अब बहुत परेशां हूँ इस सफर से 
आगे का सफर अब तू 'बता' मुझको 

दर्स-ऐ-दर्स सीखा रही है ये दुनिया 
मोहब्बत कैसे होती है 'सीखा' मुझको

तकदीर का काटा मैं भी कांट सकू 
अपने हाथो की लकीरे 'थमा' मुझको 

अर्श देख-देख आखें लाल हो चुकी 
बिंदी ही समझ माथे पे 'सजा' मुझको 

मोहब्बत नहीं 'मजबूर' बोल मुझको 
कही मर ना जाऊ अब 'भुला' मुझको 

इनायत नहीं मुहब्बत दिखा मुझको 
पत्तो से ही सही पर घर 'बना' मुझको


Friday, 5 June 2020

सब कुछ कर मिया.. 'प्यार' ना कर ( Sab Kuch Kar Miya .. " Pyar Nar Kar " )

अपना समझ बैठ.. 'इंतज़ार' ना कर
सब कुछ कर मिया.. 'प्यार' ना कर

अदब से खेलते है.. ये मतलब वाले
अपने ही आइने में.. तू 'वार' ना कर

शिकार पे निकला है तो शिकार कर
पर घायल परिंदे का 'शिकार' ना कर

जिन ईटो ने संभाला है कल तुझको
उन ईटो की तबियत 'बीमार' ना कर

गलती से जो बह गया आंख से पानी
फिर से उनका पानी 'बेकार' ना कर

अपना समझ बैठ.. 'इंतज़ार' ना कर
सब कुछ कर मिया.. 'प्यार' ना कर

Saturday, 7 March 2020

ऐसे ही नहीं कहलाती है वो औरत ( Aese Hi Nahi Kehlati Hai Wo Aurat )

इक घर को छोड़ आती है वो औरत
ऐसे ही नहीं कहलाती है वो औरत

Ek Ghar ko chhodh Aati hai wo aurat
aese hi nahi kahlati hai wo aurat

कहते है घर बनाया है आदमी ने
पर ईटों को अंदर से सजाती है वो औरत

इक घर को छोड़ आती है वो औरत
ऐसे ही नहीं कहलाती है वो औरत  ,१

kehte hai ghar banaya hai aadmi ne
par eeto ko ander se sajati hai wo aurat

Ek Ghar ko chhodh Aati hai wo aurat
aese hi nahi kahlati hai wo aurat

जिस बल पे तुम्हें घमंड है जालिमो
उस खून को स्तन से पिलाती है वो औरत

तुमने लगा दी कीमत दहेज़ में उसकी
रो-रो कर विदाई पे बताती है वो औरत

इक घर को छोड़ आती है वो औरत
ऐसे ही नहीं कहलाती है वो औरत  ,२

jis bal pe tumhein ghamnd hai zalimo
us khoon ko istan se pilati hai wo aurat

tumne laga di kimat daheej me uski
ro ro kar vidaai pe batati hai wo aurat

Ek Ghar ko chhodh Aati hai wo aurat
aese hi nahi kahlati hai wo aurat

बच्चो की भूख ने मार दिया है उसको
इस वजह से कोठे पे जाती है वो औरत

दाग नज़र से क़त्ल करता 'मजबूर' ज़माना
तभी खुदको 'निर्भया' पाती है वो औरत

इक घर को छोड़ आती है वो औरत
ऐसे ही नहीं कहलाती है वो औरत  ,३

bachho ki bhukh ne maar diya hai usko
is wajah se kothe pe jaati hai wo aurat

daag nazar se katal karta 'majboor' zamana
tabhi khudko 'nirbhaya' paati hai wo aurat

Ek Ghar ko chhodh Aati hai wo aurat
aese hi nahi kahlati hai wo aurat

-- © Sanjeet Kushwaha

Ghazal

Meri Behan Chali Tu Jayegi | itzskushwaha Poetry

एक दिन अपने कंगन लेकर मेरी बहन चली तू जायेगी सबका मायूस सा मन लेकर मेरी बहन चली तू जायेगी कुछ दिन ये घर सुनसान लगेगा तेरे यहां ना होने से इन...

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