इनायत नहीं मुहब्बत दिखा मुझको
पत्तो से ही सही पर घर 'बना' मुझको
मैं अब बहुत परेशां हूँ इस सफर से
आगे का सफर अब तू 'बता' मुझको
दर्स-ऐ-दर्स सीखा रही है ये दुनिया
मोहब्बत कैसे होती है 'सीखा' मुझको
तकदीर का काटा मैं भी कांट सकू
अपने हाथो की लकीरे 'थमा' मुझको
अर्श देख-देख आखें लाल हो चुकी
बिंदी ही समझ माथे पे 'सजा' मुझको
मोहब्बत नहीं 'मजबूर' बोल मुझको
कही मर ना जाऊ अब 'भुला' मुझको
इनायत नहीं मुहब्बत दिखा मुझको
पत्तो से ही सही पर घर 'बना' मुझको
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