काश वो इतना मक्कारी ना करता
तो शायद 'मजबूर' श्यारी ना करता
बातो का यकीं नहीं तेरा ज़हन कैसा है
आपका बचपना तो नहीं गुरूर पैसा हैआप ज़्यादा हो अभी हम बहुत ही कम है
हम धोकेबाज नहीं आँखों में कुछ शर्म है
ये सुनते ही सबके मुँह फिर गए
तेज हवाओ में मेरे घर गिर गए
हुनर खुद निकलेगा वैसे ही हाथो से
जैसे बुलबुले निकलते है बच्चो के झाग से
तुम क्या चुन रहे हो इस छोटे से बाग़ से
बेवज़ह ही खेल रहे हो अकेले आग से
bhai padh ke aakho maien ansu aa gaya
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